सच्ची कहानी – परिणाम

इस कहानी के पात्र वास्तविक नहीं है, लेकिन कहानी सच्च और जूठ का परदाफास करती है।

जो हठ साधना है साधु संतो की, बहुत कठिन होती है, उन्हें कई दिन भूखे-प्यासे रहकर सत्य को सामने लाना पड़ता हैं।

वो ऐसे काम कर जाते है जो उनकी दुनियाँ के ही बस की बात होती है, जो हर इंसान की सोच से भी परे होते है।

(यह भ्रम नहीं सत्य है ना ही कोई अंधविश्वास है)

आएऐ पढ़ते है कहानी – परिणाम

‘अरुण जा जाकर देख, बाहर कोई आया है।’

‘माँ कोई साधू है, इसको को कोई दान दक्ष्णा दे दो।’

‘घर में मेरे पास तो कोई खुला पैसा है ही नहीं..तू उसे कह, फिर कभी आना और दान ले जाना।’

‘बाबा फिर कभी आना, जब तक मैं बारहवीं कक्षा में से पास भी हो जाऊँगा, मैं तुझे खुश कर दूँगा, आप मेरी ईश्वर के आगे यही दुआ करना, मैं अच्छे नंबरों के साथ के पास हो जाऊँ।’

‘जे ले बच्चा तुझे, मैं गुरमंत्र देता हूँ, अपना हाथ कर ये ले चार दाने, अब मुट्ठी बंद कर ले, अब अपनी मुट्ठी खोल ले।’

‘यह क्या बाबा ! चार से बीस दाने बन गए।’

यह बाबा ने खुश होकर तुम्हारे धन में विस्तार किया है,
तुझे कोई भी अब नहीं रोक सकता, पास होने से।

बाबा, परन्तु बाबा मेरा एक पेपर बहुत ही बुरा हुआ, वह पेपर मुझे कहीं दूसरी ‘न डालना पड़ जाए, अब इस बात की चिन्ता है।
संतों के होते हुए ‘तू’, उस में से भी अच्छे नंबर ले जायेगा।

‘अब तू बाबा को कटोरी, चिनी की तो देदे।’

थोड़े समय बाद…

अरुण बेटा, “आज तो चिनी भी नहीं, हम आज चाय के बगैर ही रह गए,
पता नहीं चिनी थोड़ी सी थी, डिब्बे में ज्यादा नहीं थी , प्रातःकाल बचती तो थी “

“पिता जी आज की बात बताऊ, “आज एक संत आया था वह कहता कोई बात ‘नहीं, तू पेपरों पास हो जाएगा।”

अरुण पुत्र, इस तरह के बाबे तो पाखंडी होते हैं, वह जादूगर की तरह भ्रम डाल देते ने, मय तो इन को कभी – कभी चलन्नतरी भी कह देता हाँ, बेटा, “यह रंग – बरंगी है दुनिया यहाँ सत्य भी है और झूठ भी।”

एक बार की बात है…

मेरी चाय की दुकान पर एक गाड़ी रुकी, जिस में पाँच सात साधु उतरे, मुझे कहने लगे, “हम बहुत दूर से आए हैं, हमें बहुत भूख लगी है..रोटी खिला दे बच्चा।”

मैंने कहा, “क्यों नहीं संत जी, आप पंगत लगायो, मै तुम्हे पहले चाय पिलाता फिर रोटी का भी प्रबंध कर देता हूँ, आप बैठो बस थोड़ा सा इंतज़ार करों। “

“संतों ने खूब जी भर कर रोटी खा ली, पास लगी ताजिया मुलियाँ भी रोटी के साथ बड़े स्वाद के साथ खाई, मैंने संतों की खूब सेवा की।”

कुछ समय आराम करने के बाद में मुझे कहा,

” बेटा तू हमारी बहुत सेवा की है, हम तुझे कुछ दिखाना चाहते है। यह देख कुछ तस्वीरें यह हमारे परिवार की हैं, मैंने देखा उन्होंने कुछ तस्वीरों साधुओं की इकट्ठे की हुई थीं, फिर मुझे उन्होंने मुझे अपनों बातों में डालकर कहा, “यह जो तू घड़ी लगाई है यह हमें दे दे, यह बाबों को पसंद आ गई है, मैंने घड़ी खोल तो दी, परन्तु मेरा दिल नहीं करता था, की मैं यह कीमती घड़ी उनको दे दूँ। “

उन्होंने मुझे तेरी कसम दिला कर, “तू अपने एक बेटें की कसम खा, तू हमें यह घड़ी देने से, इन्कार नहीं करेगा।”

मैंने घड़ी उन को खोलकर दे दी, बाबों ने जीप को चालू किया और चलते बने।”

मुझे बाद ‘में’ एहसास हुई कि वह साधूओं के भेष में आम बंदे ही थे, जो मुझे लूट कर ले गए।

अरूण बेटा, जब मुझे एक असली संत मिला, “संत बनने के लिए भी मेहनत करनी पड़ती है, भूखे प्यास रह कर, ईश्वर का नाम जपना पड़ता है, उनको पता होता है कौन सी वस्तु आपके के लिए हानिकारक है, कौन सी वस्तु लाभदायक है।”

उस समय…

अंकतबाद का पंजाब में पूरा ज़ोर था, हर तरफ़ अखबारों में बस अंकतबाद की खबरों के साथ लोग सहमे हुए थे।

ये ले बाबा मैं चाय ले कर आया, तुम्हारे लिए,

बाबा कुछ न बोला,

मैं रोज़ उस शख्स के लिए एक कप कभी-कभी चाय ले जाता, आस-पास जंगल वह कभी, कहीं पड़ा होता, कभी कहीं बैठा होता, लोग उसे कई मस्त या संत कहते।

ऐसे लगता जैसे, उसके लिए अपना ही संसार, सब कुछ हो, कोई रोटी दे गया तो ठीक, नहीं तो वह घूमकर खा लेता, अगर कोई दे दो तो ठीक, नहीं उसे कोई फर्क न पड़ता, ऐसे लगता उस के लिए धरती आसमान एक हो, एक ही जगह, उसका बैठे रहना।

एक बार की बात है,

सूरज डूबने वाला ही था, मैं चाय लेकर चला गया।

संत कहने लगा, तू चाय लेकर आया है, रख दे,

मेरी बात सुन, कल आतंकवादी आऐंगे, तेरी दुकान पर, जा तू, दुकान छोड़कर, कहीं दूर चला जा।

कल के दिन के लिए, चला जा…दूर चला जा..।

मैंने आकर, यह बात साथ की दुकान वाले को बताई, मैंने कहा,

जंगल में जो साधु फिरता है, वह मुझे ऐसे कह रहा, मेरी बात मान हम कल दोनों दुकान नहीं खोलते हैं।

शामे ने कहा, मैं तो नहीं बंद करूँगा, दुकान मैं क्यों उस पागल वन्दे के पीछे लगूँ, उसे अपनी तो चेतना नहीं, आऐंगे आतंक !!!

मैंने उस दिन दुकान न खोली , आतंकवादी आए, मेरी दुकान ‘में’ तोड़फोड़ कर गए, शामे को मेरी दुकान का मालिक पूछने लगे, शामे ने कहा, “उसे पता है , इस दुकान के मालिक का, वह जो पड़ा।”

(उस संत की तरफ इशारा कर दिया)

आतंकवादियों ने उस संत के पास से थोड़ा बहुत पूछने की कोशिश की, जब कुछ बोला न वह,

जाते हुए शामे को गोलियों के साथ भून गए।

दूसरे दिन आस-पास सन्नाटा छाया हुआ था,

अखबार वाला आया, अखबार फैंक कर चला गया,

जब मैंने अखबार उठाकर पढ़ी तो मैंनें पहले पन्ने पर लगी ख़बर पढ़ी।

भयानक सड़क हदसे में आतंकवादियों की हुई मौत, जिन्होंने प्रसिद्ध शामे दुकानदार को चढ़ाया मौत के घाट !!!

लेखक:
संदीप कुमार नर

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  1. Yogendra Singh