सुप्रीमकोर्ट की बचकानी नसीहतें

देश का सर्वोच्च न्यायालय यानी “सुप्रीमकोर्ट” जिसकी पहचान किसी से छिपी नहीं है। सुप्रीमकोर्ट वो जगह है जहाँ कोई फरियादी अपनी अंतिम आस लेकर पहुँचता है। यह कहना गलत नहीं होगा की देश के सर्वोच्च न्यायालय नें हर सच्चे फरियादी को न्याय दिया है, ऐसा बहुत कम ही देखने को मिला है कि सुप्रीमकोर्ट नें कभी कोई गलत निर्णय दिया हो। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ भिन्न जातियां, वर्ग समुदाय, धर्म व उनकी मान्यताएं हों वहाँ न्यायालय का महत्त्व और भी गहरा जाता है। मुझे ये कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय नें भारत जैसे जटिल राष्ट्र को जोड़ने, संभालने और उचित न्याय देने का कार्य अब तक बड़ी ईमानदारी से किया है।

कभी अपने फैसलों से वाह-वाही लूटने वाला सुप्रीमकोर्ट आज के आधुनिक दौर में हास्य का प्रतीक भी बनता जा रहा है। हालिया गुजरे कुछ वर्षों एवं वर्तमान में भी देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिए गए निर्णयों का लोगों नें जमकर मजाक उड़ाया है। सुप्रीमकोर्ट पर रोज बनते हुए लतीफे, चुटकुले अथवा कार्टून उच्च न्यायालय की गरिमा को धूमिल करते जा रहे हैं; इससे भी बड़ी हैरत की बात ये है कि सुप्रीमकोर्ट इन बातों से बेखबर हो लगातार बचकानी नसीहतें देता चला जा रहा है। एक ओर देश की राजनीतिक पार्टियां और उनके नेतागण प्रतिदिन अपना उपहास बनाते जा रहे हैं वहीँ दूजी ओर सुप्रीमकोर्ट भी उनके इस चलन में शामिल होता जा रहा है। कानून की आड़ में न्यायालय से खेलना कुछ विशेष प्रवृति के लोगों का प्रमुख कार्य है और यह भी दुर्भाग्य है की कोर्ट उनकी हर ऊट-पटांग याचिका को गंभीरता से लेने लग गया है। देश में तमाम गंभीर याचिकाएं हैं, लंबित पड़े जटिल मामले हैं पर कोर्ट उनको प्रमुखता से लेने की बजाय ईद, बकरीद, मोहर्रम, दशहरा, दिवाली, होली, दही हांड़ी, जलिकट्टू जैसे पारंपरिक त्यौहारों में अपनी नसीहतें दे रहा है। कोर्ट द्वारा दी जाने वाली बचकानी नसीहतों की खिल्ली आम आदमी तो उड़ा ही रहा है, उसके साथ देश में उपस्थित कई गरिमामान व्यक्ति भी कोर्ट की नसीहतों पर दबे मुँह मुस्कुरा रहे हैं तो कई कोर्ट में न्याय का प्रतीक माने जाने वाले जजों को विशेष वर्ग के हाथों का खिलौना भी कहने से नहीं कतराते। क्या देश का सर्वोच्च न्यायालय किसी गाँव की पंचायत सभा जैसा बर्ताव कर रहा है ? मेरा उत्तर तो हाँ है !!

व्यक्तिगत बात कहूं तो सुप्रीमकोर्ट में त्यौहारों को लेकर दी जाने वाली याचिकाएं भी ठीक त्यौहारों की तरह मौसमी होती जा रहीं है; याचिका कर्ताओं नें अपने कैलेंडर साल भर के लिए तैयार कर रखे हैं, बस वे उसी इंतज़ार में रहते हैं की कैसा त्यौहार आ रहा है और उसके लिए कैसी याचिका दाखिल करनी है। राजनीति से प्रेरित वे सभी याचिकाएं एक विशेष धर्म व् उसकी पारंपरिक मान्यताओं को समाहित किये हुए है, ऐसे में उसको हिन्दू मुस्लिम की नज़र से देखने वाले लोग भी अपनी जगह सही हैं। धार्मिक परंपराओं में न्यायिक हस्तछेप देश में सौहार्द्य के माहौल को और अधिक ख़राब करता जा रहा है जिससे हमारी अदालतें बेखबर हैं। भारत अपने विभिन्न धर्मों और उनकी पारंपरिक मान्यताओं के लिए ही जाना जाता है जिसे हम एक शब्द में संस्कृति भी कहते हैं।

सभी धर्मों से जुड़ीं मान्यताएं, विधियां अथवा रीति रिवाजों के पालन के दौरान उनसे होने वाले किसी भी तरह का प्रदुषण इत्यादि भारत की मूल समस्या नहीं है। मूल समस्या है देश में फैला कुपोषण, गरीबी, हत्या, बलात्कार, बेरोजगारी, रंग भेद, जाति भेद, भुखमरी, भ्रष्टाचार, नारी सुरक्षा, भ्रूण हत्या, दहेज़ उत्पीड़न, शारीरिक शोषण, घूसखोरी, महँगी शिक्षा, महँगी चिकित्सा, लचर प्रशासनिक व्यवस्था, किसान आत्महत्या और अंत में महँगा न्याय। परन्तु यह दुःखद है कि देश की असल मूल समस्याओं को दर किनार कर सर्वोच्च न्यायलय भी रीती रिवाजों व् परंपराओं में दखल का माध्यम बनता जा रहा है जिसका इस्तेमाल देश में मौजूद चंद विशेष विचारधारा के लोग बखूबी कर रहे हैं। जो लोग त्यौहारों के मौसम में नाना प्रकार के प्रदूषणों की बात करते हैं काश वे कुछ अन्य गंभीर पहलुओं पर भी गौर करते। स्वघोषित बुद्धिजीविओं का संगठन देश में उपस्थित मूल समस्याओं के खिलाफ याचिका दाखिल नहीं करता, असल में उन्हें वास्तविक समस्याओं से कोई लेना देना ही नहीं है, सिवाय तुष्टिकरण की राजनीति के।

यह जरूरी है कि न्यायालय दाखिल की गयी याचिकाओं पर ध्यान दे पर कोर्ट को यह भी देखना होगा की कहीं उसका इस्तेमाल तो नहीं हो रहा। हमारे देश के संविधान में न्यायपालिका और कार्यपालिका का अपना-अपना क्षेत्र निर्धारित किया गया है। न्यायपालिका जिसके अंतर्गत समस्त न्यायालय आते हैं और कार्यपालिका जिसके अंतर्गत संसद आता है। यहाँ यह कहना होगा कि समाज सुधार की जिम्मेदारी कोर्ट की नहीं बल्कि संसद और नेताओं की है। पर विगत कुछ वर्षों से कोर्ट अपने न्यायपालिका के कर्तव्य से हटकर समाज सुधारक की तरह बर्ताव कर रहा है। अगर इन नेताओं को हर समस्या कोर्ट से सुलझानी है तो फिर इन नेताओं की देश में क्या उपयोगिता ? कोर्ट – ईद, बकराईद, मोहर्रम, होली, दिवाली, दुर्गा पूजा, विसर्जन, दीप, पटाखे आदि से जुड़ी हर याचिका को तरहीज देना बंद करे और ना ही उसपर अपनी नसीहतें दे। ये कार्य उन नेताओं पर छोड़ दे जिनको चुनकर लोगों नें संसद में भेजा है। न्यायपालिका अगर समाज सुधार में समय नष्ट करेगा तो देश में प्रतिदिन होते आपराधिक मामले और उससे जुड़े न्याय की प्रतीक्षा करने वाले लोगों की कतारें और अधिक लंबी होती चली जायेंगीं।

देश का सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीमकोर्ट कहीं पटाखों पर नसीहत देता है, कहीं प्रदूषण पर, कहीं मूर्ति विसर्जन पर, कहीं दुर्गा पंडाल पर, कहीं दही हांड़ी की ऊंचाई पर, कहीं बैलों के खेल पर, कहीं ताजिया जुलूस पर; मुझे नहीं लगता की यह सुप्रीमकोर्ट के स्तर का कार्य है। ये सभी छोटी सामाजिक समस्याएं हैं जिनका हल राजनीतिक दल अपने स्तर से निकाल सकते हैं । जिस प्रकार सुप्रीमकोर्ट को एक खिलौने की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है उससे तो यही लगता है कि देश में राजनीतिक पार्टियों की कोई आवश्यकता ही नहीं रह गयी है। कोर्ट द्वारा दी जाने वाली नसीहतों का मजाक भी बनता जा रहा है जिसके लिए जिम्मेदार भी कोर्ट ही है। हर फिजूल की याचिका पर कोर्ट को सख्ती से पेश आना होगा, याचिका कर्ताओं को फटकार लगाने के साथ-साथ सरकार को भी कटघरे में लाना होगा; बजाय इसके की कोर्ट अपनी तरफ से प्रतिबन्ध व् नसीहतें लागू करे।

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