ब्लू व्हेल और हम

कांधला में गुरूवार को कक्षा 7वीं के एक क्षात्र नें ट्रेन से कट कर आत्महत्या कर ली। वजह का जब पता चला तो “ब्लू व्हेल” नामक खेल का नाम सामने आया। हिन्दुस्तान समेत अन्य कई देशों में भी ब्लू व्हेल मोबाइल गेम से हो रही मौतें चिंता का विषय बनीं हुयी हैं। देश के सर्वोच्च न्यायलय नें भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए मौत के इस खतरनाक खेल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने को कहा है। यकीनन यह चिंता का विषय है पर इसकी क्या गारंटी है कि एक Blue Whale को प्रतिबंधित कर देने से बाकी सारे ब्लू व्हले जैसे खेल भी प्रतिबंधित हो जायेंगे ? देश की अदालत और सरकार का काम क्या यही रह गया है कि वो हर व्यक्ति, बच्चे व् बूढ़े का मोबाइल फ़ोन चेक करती चले ?

कहते हैं आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, मैं इसको थोड़ा और आगे बढ़ाऊ तो आविष्कार से ही आधुनिकता की उत्पत्ति होती है। जरा अपने आस पास नजरें उठाकर तो देखिये हर तरफ आधुनिकता है। चारों ओर फैला आधुनिकता का यह शोर हमारी चेतना को नष्ट कर चुका है; इंसान विवेकहीन हो चला है।

अरविन्द कुमार जो किसी ज़माने में बिहार से दिल्ली आये थे पढ़ने के लिए, पढ़ाई लिखाई के दौरान ही उनका दिल दिल्ली में ही बस गया। नौकरी प्राप्ति के उपरांत अरविन्द कुमार नें दिल्ली की रहने वाली लड़की स्वेता से विवाह कर लिया। स्वेता के परिवार वालों नें अरविन्द के सम्मुख यही शर्त रखी थी कि हमारी बेटी कभी बिहार में नहीं रहेगी। अरविन्द कुमार की ज़िद के आगे उनके माता पिता भी यह विचित्र शर्त मानने को राजी हो गए। अरविन्द और स्वेता के विवाह को पूरे 14 साल हो गए हैं, इन चौदह सालों में कभी भी स्वेता बिहार नहीं गयी। अरविन्द के माता पिता जी अपना गांव-घर छोड़कर दिल्ली में रहने को राजी नहीं वे आज भी गांव में हैं। अरविन्द कुमार नियमित रूप से प्रतिवर्ष अपने माता पिता से मिलने बिहार चले जाते हैं पर वे कभी स्वेता और अपने बेटे आकाश को गांव नहीं ले जा पाए। अरविन्द के पिता शम्भू इस साल चाहते हैं की उनका बेटा पूरे परिवार समेत गांव आये। पिता की यह इच्छा सुन अरविन्द अपनी पत्नी स्वेता से यह कहते हैं – सुनो, बाबूजी का फ़ोन आया था, कह रहे थे कि इस बार गांव आ जाओ आकाश और स्वेता को लेकर। पत्नी स्वेता बोली- फिर से उनकी वही ज़िद, तुम्हारे बाबूजी भी एक दम……!!! देखो अरविन्द मैं कोई गांव-वाओं नहीं जाने वाली और ना ही मेरा बेटा जायेगा। अरविन्द नें फिर आग्रह किया – स्वेता, अब माँ बाबूजी की उम्र ही कितनी रह गयी है; कुछ दिन वहां रह आओगी तो उनका भी मान रह जायेगा। स्वेता नें कहा – देखो अरविन्द हमारी शादी इसी शर्त पर हुई थी की तुम कभी भी मुझे बिहार ले जाने के लिए नहीं कहोगे।

पत्नी का सख्त इंकार देख अरविन्द नें आगे कुछ नहीं कहा। दोनों पति पत्नी नौकरी में थे, बेटा आकाश अधिकांश अकेले ही रहता था। भगवान की दया से घर में सबकुछ था; रुपये पैसे या किसी वस्तु की कोई कमी नहीं थी। समय धीरे धीरे यूं ही किसी नदी के समान प्रवाहित हो रहा था, अरविन्द और स्वेता ऑफिस के काम काज में अब पहले से ज्यादा व्यस्त रहने लगे थे। बेटा आकाश अब 7 साल का हो चुका था पर मां बाप का प्यार उसे अब भी नसीब न होता। आकाश की दुनियां कंप्यूटर, टीवी, वीडियो गेम और स्मार्टफोन तक ही सीमित थी।

इधर कुछ दिनों से आकाश किसी से बात नहीं करता था। चुप-चाप अपने आप में ही लीन रहता था; घर की नौकरानी, रानी नें स्वेता से यह बात कही – मैडम जी, आकाश बाबा चुप से रहते हैं अब; मैं जब उनको हंसाने का प्रयास भी करती हूँ तो वो हँसते नहीं। स्वेता नें उत्तर दिया – उफ़….रानी इसमें परेशानी क्या है ? अच्छा ही है ना !! ही इज माय स्वीट बेबी, वो बहुत समझदार है..न बोलना कोई गन्दी बात तो नहीं। स्वेता नें आगे कहा – अरविन्द कुछ मंथ के लिए बाहर गए हैं न..इसलिए वो थोड़ा उदास रहता होगा। डू नॉट वॉरी डार्लिंग इट्स ओके !! मैडम की ये बात सुन नौकरानी रानी नें फिर कभी स्वेता से कुछ न कहा।

आकाश की उदासी अधिक गहराती गयी। सुबह 7 बज चुके थे…..नौकरानी आकाश के कमरे का दरवाजा पीटते हुए। आकाश बाबा….आकाश ? आकाश ? रानी के चिल्लाने के आवाज सुन स्वेता दौड़ते हुए आयी। व्हाट्स हैपन ?? व्हाई यू शॉउटिंग ? दोनों की लाख कोशिशों के बाद भी आकाश के कमरे का दरवाजा नहीं खुला। कुछ ही देर में किसी नें घर के मुख्य दरवाजे पर दस्तक दी !! स्वेता की तरफ इशारे करता हुआ बोला – प्लीज आप मेरे साथ नीचे आईये। आकाश के कमरे की बालकनी के नीचे कोई और नहीं बल्कि आकाश ही गिरा पड़ा था।

स्वेता बदहवास, पड़ोसियों का जमवाड़ा !! इतने में पुलिस भी वहां आती है और आकाश को उठाकर हॉस्पिटल की तरफ ले जाती है। मगर हॉस्पिटल जाना तो सिर्फ एक औपचारिकता ही थी; सच तो ये है कि आकाश अब इस दुनियां में नहीं था। किसने आकाश की जान ली ? क्या “Blue Whale” नें ?

असल में आकाश की जान ब्लू व्हेल नें नहीं ली; आकाश की जान उसकी माँ स्वेता और पिता अरविन्द कुमार नें ली।

आधुनिकता के करीब पहुँचने की खातिर इंसान खुद से दूर होता जा रहा है। क्या हो जाता अगर स्वेता गांव चली जाती, क्या हो जाता अगर अरविन्द पत्नी की बात न मानकर बेटे आकाश को उसके दादा दादी के पास ले जाता। बेशक गांव में आधुनिकता नहीं है, पर वहां वो सबकुछ है जिसकी जरूरत हर एक इंसान को होती है; और वो है प्यार।

भला किसी ब्लू व्हेल नामक मोबाइल फ़ोन गेम की क्या हैसियत जो कि एक जीते जागते इंसान को मार दे। इंसान तो आधुनिकता नामक ब्लू व्हेल से प्रतिदिन मर रहा है। एक दिन ये ब्लू व्हेल मछली और बड़ी हो जायेगी जिसके मुँह में आकाश के साथ साथ हम सब भी समां जायेंगे।

 

 

लेखक:
रवि प्रकाश शर्मा