Growing Relationships in Modern India – Why should we go with our traditional way

संस्कृति का नाश ही अपराध को जन्म देता है” जो आज भारतवर्ष में हो रहा है। मेरा ये लेख पुरुष और महिला दोनों पर आधारित है किसी एक को दोषी ठहराना मेरा उद्देश्य नहीं है। यू तो मैं खुद युवा वर्ग से आता हूं पर अपने घर-परिवार के संस्कार और देश कि संस्कृति का पालन जिसे मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूँ। हिंदुस्तान निश्चित ही अब आगे बढ़ रहा है , विकास कर रहा है ; परिवार कि बेटियां और बेटे अब एक सामान समझे जाने लगे हैं और सबको आगे पढ़ने एवं नौकरी करने की पूर्ण आज़ादी मिल रही है क्योंकि आज अभिभावक नें अपनी पुरानी सोच को बदला है।

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एक दौर था जब इसी देश में बेटियों को घर से बाहर निकले तक की आज़ादी नहीं थी , बेटे के बराबर उनको समझा नहीं जाता था ; उनके लिए पठन – पाठन तो दूर की बात थी कुमारी अवस्था में ही उनका विवाह कर दिया जाता था। किन्तु “बदलाव ही संसार का नियम है” ऐसा कहा जाता है और ऐसा हुआ भी घर कि महिलाओं व बेटियों नें अपने कदम बाहर निकाले और पुरुष के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने लगीं। आज कि नारी अबला नहीं है , दुर्बल नहीं है , अनपढ़ नहीं है ; आज की नारी समाज में एक खास औधा रखती है वो हर छेत्र में अपना लोहा मनवा चुकी है। यक़ीनन ये बदलाव सराहनीय है कि आज पुरुष और महिला एक साथ आगे बढ़ रहे हैं , घर परिवार कि ज़िम्मेदारियों का निर्वाह साथ मिलकर कर रहे हैं।

सवाल ये है क्या पुरुष और महिला नें अपनी आज़ादी का प्रयोग सकारात्मक दिशा में किया ? क्योंकि जिस तरह देश में युवा अपराध बढ़ते जा रहे हैं उनकी गिनती से तो यही लगता है कि हमनें अपनी आज़ादी को आज एक अपराध का रूप दे दिया है। यूँ तो युवा अपराध के कई रूप हैं सभी रूपों को एक लेख के अंदर दर्शा पाना मुश्किल है इसलिए मैं केवल एक ही बिंदु पे बात कर रहा हूँ और वो बिंदु है आधुनिक भारत में युवाओं का आपसी सम्बन्ध जो कि मित्र , प्रेमी , प्रेमिका जैसे शब्दों संबोधित किया जाता है।

१- पुरुष और स्त्री कि मित्रता: ये को अपराध नहीं है बल्कि बदलते हुए माहौल जहा लड़का , लड़की एक स्कूल व कॉलेज में एक साथ पढ़ रहे हैं ऐसे में उनका आपस में मित्र होना कोई गुनाह नहीं है। पठन – पाठन के अलावा युवा महिला और पुरुष एक साथ सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में कार्यरत भी हैं जिससे उनमें दोस्ताना सम्बन्ध बन ही जाते हैं जो कि आज आधुनिक भारतीय समाज के द्वारा स्वीकृत भी हैं।

२- पुरुष और महिला का प्रेम सम्बन्ध: “प्रेम इस सृष्टि का सबसे सुन्दर उपहार है” जिसके माध्यम से संसार का समस्त प्राणी जुड़ा है क्योंकि अगर प्रेम न होता तो आपसी संबंधों में मधुरता न होती हर सम्बन्ध रूखे, कड़वे और कठोर होते परंतु प्रेम हमारे आपसी सम्बन्ध को मधुर बनाता है। एक दूसरे के करीब जाना , मोहित हो जाना , सम्मान करना , आदर करना ये प्रेम कारणवश ही मुमकिन है। लिहाजा मैं सत्य प्रेम संबंधों को भी उचित मानता हूँ जो प्रेम का आदर करते हैं और अपने प्रेम सम्बन्ध को समाज का न्यायिक रूप देकर सकुशल जीवन निर्वाह करते हैं।

३- लिव इन रिलेशनशिप: संभवतः ये शब्द कई लोगों के लिए नया है खासकर घर के बूढ़े – बुजुर्ग तो इसकी परिभाषा नहीं जानते होंगे। ये शब्द हिंदुस्तान में पश्चात् संस्कृति का प्रभाव दर्शाता है। आधुनिकीकरण के दौर में भारत भला क्यों पिछड़ा रहे; जी हाँ – देश के उच्च न्यायालय यानि कि सुप्रीमकोर्ट ने लिव इन रिलेशन को न्यायिक मान्यता दे दी है शर्त ये है कि लड़का और लड़की १८ वर्ष से काम उम्र के ना हों।

थोड़ा इसको विस्तार से जानते हैं – १८ वर्ष की लड़की और १८ वर्ष का लड़का अगर लगातार कई वर्षो से एक दूसरे के साथ रह रहे हों बिना शादी किये तो उन्हें शादी – शुदा ही समझा जायेगा और ठीक शादी जैसी ही न्यायिक मान्यता मिलेगी। इस दौरान अगर उनसे कोई औलाद पैदा होती है तो उसे उन्हें माँ बाप का दर्जा देना होगा और उसके भरण पोषण की जिम्मेदारी भी उठानी होगी।

इतना ही नहीं , इस लिव इन रिश्ते में लड़की का लड़के की सम्पत्ति पे भी पूर्ण अधिकार है ठीक जैसे पत्नी का होता है। कोई भी सामाजिक बन्धन उनके इस रिश्ते कि अवहेलना नहीं कर सकता न ही उन्हें घर की सम्पत्ति से बेदखल कर सकता है।

४- एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स: पति एवं पति का शादी – शुदा होते हुए भी किसी अन्य स्त्री, पुरुष से सम्बन्ध होना इसे हम एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स कि श्रेड़ी में आंकते हैं। ये भी पश्चात संस्कृति की देन ही है जो हमारे पारस्परिक रिश्ते को अंदर से खोखला करती जा रही है।

उपयुक्त चारों रिश्ते अब आधुनिक भारतीय समाज का हिस्सा बन चुके हैं पर इनमें भी एक कड़वी सच्चाई है जो गुनाह को जन्म देती है। आईये एक नज़र डालते हैं इन रिश्तों कि कमजोरी पर।

आखिर ऐसा क्या है जब कोई किसी का मित्र बनता है, उससे प्रेम करता है , उसके साथ लिव इन में रहता है फिर अचानक एकदिन खबर आती है कि उसने अपनी प्रेमी/प्रेमिका को मार दिया , जिसके साथ रहता था उसका/उसकी हत्या हो गयी क्यों ? हम आयेदिन ऐसी खबरों का सामना करते हैं और अब ये दिनोदिन बढ़ती ही जा रही हैं। विगत कुछ वर्षों से हमारे समाज में इस तरह का एक नया अपराध अपनी जड़ें मजबूत करता जा रहा है जिसके आगे कानून भी विवश दिखाई पड़ता है। फिर इस अपराध को रोके कैसे जो न सिर्फ हमारे पारिवारिक रिश्तों कि बलि दे रहा है बल्कि आने वाली युवा पीढ़ी को भी दिग्भ्रमित कर रहा है। मैं अगर सीधे सन्दर्भ में कहूँ तो विदेशी संस्कृति को अपनाने की चाहत, खुद को आधुनिक कहलाने की लालसा हमें इस दलदल में धकेलती जा रही है।

वो कहते हैं न कि –

पत्थर तब तक सलामत है जब तक वो पर्वत से जुड़ा है , पत्ता तब तक सलामत है जब तक वो पेड़ से जुड़ा है और इंसान तब तक सलामत है जब तक वो परिवार से जुड़ा है

परायों को अपनानें की चाहत में अपनों को खोना देना ही एक मात्र कारण है जो हमारी युवा पीढ़ी को भटका रहा है। हक़ीक़त में सच्चे प्रेम का तो बोध किसी को है नहीं जो हमारे निकट है जिसे हम परिवार कहते हैं , संस्कार कहते हैं , संस्कृति कहते हैं ; बड़े बुजुर्गो और माता पिता की बातों को हमने ताक पे रख दिया है जिसकी बदौलत हमारा वजूद है। कभी हम घरों से बहार निकलनें की राह टटोटते थे और आज बाहर आये तो अमर्यादित हो गए।