हरित वातावरण और सरकारी व्यय

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वातावरण को लेकर सभी देश , सरकार व समाज का हर वर्ग चिंतित है । परंतु उसके लिए त्याग की भावना शून्य है। हर सरकार भारी भरकम बजट बनाती है। हर शहर में हॉर्टिकल्चर विभाग होते है। हजारों स्टाफ करोड़ों अरबों का बजट पर हम वहीं खड़े हैं, कोई विशेष उत्थान नहीं हुआ। इसके कई कारण हो सकते हैं।

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परंतु जो मेरे भीतर है सरकार जो पेड़ पौधे लगाती है निश्चित रूप से वातावरण के लिए और समाज के लिए लाभकारी है। परंतु अगर सरकारी विभाग शो पीस पेड़ो की जगह फल व कियारियों की जगह सब्जी या कोई भी मानव के उपयोग के पेड़ लगाए तो समाज उसकी देखभाल स्वयं भी करेगा । और कोई ना कोई इसका लाभ भी लेगा। नई दिल्ली के लुत्यन ज़ोन में जामुन ओर आम के पेड़ो की भरमार है; जो आज हम फायदा उठा रहे है। सरकार को भी आम जामुन अनार नीबू नीम या क्षेत्र और वातावरण के अनुसार उपभोग की जाने वाले पेड़ पौधे शामिल करने चाहिए। दिल्ली की रिज एरिया और जंगल एरिया की देखभाल और नए पेड़ स्थापित करने में करोड़ों खर्च होते है और वो अधिकतर किकर बबूल होते है। जिनका सिर्फ एक लाभ मिलता है शुद्ध हवा हरियाली, पर अब एक तीर से कई शिकार किए जा सकते हैं। तो सिर्फ एक ही फायदा क्यों लिया जाए।

युवाओं का जुड़ना –

आजकल के शहरी बच्चों को खेती का ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ नहीं पता। हिमाचल में सेब के पेड़ बाग़ देखने क लिए शहरी लोगो से 400 रुपए का टिकट लेते है। लोग जिज्ञासा में देखते हैं और बच्चों को दिखाते हैं वो अपने सामने किसी पेड़ को बड़ा होता हुआ और उसपर फल लगते हुए देखेंगे तो उनमें खेती के प्रति रुचि बढ़ेगी। हर क्षेत्र के कृषि या बागबानी विभाग नर्सरी बनायें और निशुल्क पेड़ पौधे दें , नाम मात्र के दाम में खाद कीटनाशक इत्यादि दें। कृषि से संबंधित पुस्तिका पंपलेट इत्यादि दें। ताकि अच्छी किस्म के उत्पादन हो लोगो में जानकारी बढ़े और ये कोई बड़ा या महंगा कार्य नहीं है। नर्सरी के लिए प्रशासन के पास जमीन की कमी नहीं ओर बागबानी विभाग पब्लिक से जुड़े। क्यूंकि ये केवल सरकारों तक सीमित नहीं होना चाहिए, इसमें आम व्यक्ति को भी जुड़ना होगा; अपने लिए आने वाली नस्लों के लिए। सीमेंट के जंगलों से विकास नहीं विनाश ही होगा। विकास सिर्फ हरे-भरे जंगलों से ही होगा।

कुछ दिनों पहले हम क्रिकेट खेलने यमुना के नजदीक गए। ग्राउंड के लिए शुल्क लेने वालों से एक ने सवाल किया यहां सांप तो आ जाते होंगे। उसने कहा कभी कभी आ जाते है। मैंने उत्तर दिया सांप नहीं आते हम आते है, वो तो अपने घर ही हैं अपनी जगह, हम जबरदस्ती घुस रहे हैं। ऐसे ही हम जंगलों में पैसे की खातिर घुस रहे हैं। आप ने सुना होगा फला गांव में, फला शहर में तेंदुआ या जंगली जानवर घुस गए । कोई ये नहीं कहता हम जंगल में घुस गए ।

लेखक:
दानिश


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