वृद्ध आश्रम – अभिशाप या वरदान

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उन आँखों ने भी देखें होंगे कुछ ख्वाब,
ख्वाब एक भरे पूरे परिवार का,
बच्चों के प्यार और अपनेपन का,
ख्वाब खुद के सम्मान का,
जीवन के अंतिम पलों में तनाव रहित समय का ।

अपने पूरे जीवन को बच्चों की ख़ुशी के लिए समझौते का रूप दे देते हैं जो माता-पिता , क्या बुढ़ापे में उन्हें अपने घर में अपने परिवार के साथ रहने का भी अधिकार नहीँ ? उस परिवार के साथ जिसकी स्थापना उन दोनों ने ही मिल कर की थी ।

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बुढ़ापे में अकेलापन

जिन माता-पिता ने हमे हाथ थाम कर चलना सिखाया , जब उनके कदम डगमगाने लगे तो उन्हें असहाय छोड़कर बेघर कर देना क्या सही है ? कहाँ मर चुकी है आत्मा उन बच्चों की जो इतना बड़ा पाप करते वक़्त जरा भी लज्जित महसूस नहीं करते ! ऐसा करके हम अपनी संस्कृति को तो कलंकित कर ही रहे हैं , साथ ही साथ माता-पिता को पीड़ा देकर ईश्वर के भी अपराधी भी बन रहे हैं । माता पिता का सहारा बनने के बजाये उनसे किनारा क्यों कर लिया जाता है !! हमे दुख होना चाहिए कि हमें ममता की छाँव में पाल-पोस कर बड़ा करने वाले माता पिता के साथ ऐसा अमानवीय , अशोभित कार्य कर रहे हैं । किस सभ्यता से प्रभावित होकर आज हम इस तरह के गलत विचारों का अनुसरण कर रहे हैं । हमारा समाज जिस संस्कृति के कारण सारे विश्व में मान पाता था , आज गली-गली में खुले वृद्ध आश्रम उस संस्कृति के गाल पर एक तमाचे की तरह हैं ।

क्या यही हमारी प्रगति है ? या हम अपने कर्तव्यों से विमुख हो गए हैं । जहाँ परिवार एक दूसरे का सुख-दुख बाँट लेता था , उस देश मे यह उल्टी गंगा कैसे बह रही है । पश्चिम देश हमारी संस्कृति को अपनाने के लिए तरस रहें हैं और हम आँखें बंद करके भौतिक सुख सुविधा के पीछे भाग रहे हैं ।

अक्सर उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचकर बुजुर्ग अपने आप को अलग महसूस करने लगते हैं । संवेदनहीनता के इस दौर में इनके अपने ही इनकी भावनओं को समझने में नाकाम होते दिखते हैं । पहले बुजुर्गों की बात को घर में महत्व मिलता था , लेकिन इस तरह का माहौल आज के दौर में विरले ही देखने को मिलता है । धर्म शास्त्रों में भी बुजुर्गों के प्रति प्रेम और सम्मान रखने की शिक्षा मिलती है । लेकिन धार्मिक लोग भी अक्सर बेरुखे ही हैं , क्योंकि उन्होंने धर्म को आत्मसात नहीं किया बल्कि केवल दिखावे के लिए ही प्रयोग में लाए । संस्कार और धार्मिक बातें लोगों को उपदेश लग सकती हैं , पर हमें इसका फैलाव करते रहना चाहिए । धर्म की चर्चा से किसी दूसरे के जीवन में बदलाव आये या न आये पर ऐसा करके कम से कम हम तो उनपर अमल करने वाले बन सकेंगे । शायद हमारा अनुसरण करके कुछ और लोग भी सत्मार्ग पर लौट आयें ।

सन 1978 आज से 40 साल पहले जब HelpAge India ने वृद्ध आश्रम तैयार किये थे तो लोगों ने इसका विरोध करते हुए इसे पश्चिमी तरीका कहा था । लेकिन आज कई वृद्ध इन वृद्धाश्रमों पर ही आश्रित हो चुके हैं । आज यही हमारे देश की भी हकीकत बन चुकी है । सड़कों पर भटकते हुए बुजुर्गों के लिए यह वृद्ध आश्रम एक वरदान से कम नहीं , जहां उन्हें सिर छिपाने को छत और दो समय का खाना उपलब्ध हो जाता है ।

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वृद्ध आश्रम, ओल्ड ऐज होम्स में बैठे बुजुर्ग

प्रतिदिन वृद्ध आश्रमों की संख्या बढ़ने का मुख्या कारण संयुक्त परिवारों का टूटना है । समाज शास्त्रियों का मानना है की नौजवानों में आधुनिक तरीके से जीने की ललक और व्यक्तिगत जिंदगी की आजादी से जीने की सोच के कारण बुजुर्ग अकेलापन महसूस कर रहे हैं और वृद्धाश्रमों में जाने को मजबूर हैं या फिर अपने ही जने बच्चों के द्वारा वहां भेज दिए जा रहे हैं ।

वृद्धों के साथ हो रहे ऐसे बर्ताव को देखते हुए भारत सरकार ने एक विधेयक भी तैयार किया था । इस विधेयक में स्पष्ट कहा गया है की हम संयुक्त परिवार के ढांचे को दुबारा नहीं विकसित कर सकते हैं, लिहाजा वृद्ध आश्रमों का ही निर्माण करना होगा । बुजुर्ग माता पिता के कल्याण के लिए तैयार इस विधेयक के मुताबिक ऐसे बच्चों को तीन महीने की सजा भी हो सकती है जो माता पिता की सेवा से इंकार करते हैं । इस कानून के मुताबिक अगर अदालत आदेश देती है तो अपने बुजुर्गों के लिए ऐसे बच्चों को भत्ता भी देना होगा ।

स्वयम् सेवी संस्था HelpAge India की शोध बताती है की परिवार के साथ रह रहे करीब 40 प्रतिशत बुजुर्गों को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है । भारत में 7 करोड़ से भी ज्यादा आबादी बुजुर्गों की हैं , अगले 25 वर्षों में ये 10 करोड़ तक पहुँच जाएगी । सरकार ने देशभर में 600 वृद्ध आश्रम तैयार कराने की मंज़ूरी दी है । क्योंकि जब परिवारों को बचाया नहीं जा सकता तब यही एक आश्रय बुजुर्गों के पास रह जाता है ।

शास्त्रों में वृद्धा अवस्था का चित्रण अत्यंत दयनीय है, इसे सुनकर वृद्धों की घबराहट और प्रबल हो जाती है । वैराग्य-शतक (Vairagya Shatakam) में भर्तृहरि लिखते हैं ‘ शरीर पर झुर्रियाँ पड़ गई हैं । दाँत टूट गए हैं, दृष्टि नष्ट हो गई है , पुत्र शत्रु जैसा व्यवहार करता है ‘ ।

आज के दौर में यह वर्णन सही है सिद्ध होता है । अपने परिवार के लिए इतना कुछ करने वाले माता-पिता दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर हो जाते हैं । यह मत भूलिये की जो उनका आज है वही हमारा कल होगा यह निश्चित है । यदि आज हम अपने माता पिता के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं तो कल हमारी संतानें हमारे साथ भी शतप्रतिशत यही बर्ताव करेंगीं ।

माता-पिता का सानिध्य ईश्वर के आशीष के जैसा है । बुजुर्ग माता पिता को घर से अलग होने पर मजबूर न करें । उनके प्रेम के छाँव में अपने जीवन को समृद्ध बनायें ।

जिन बुजुर्गों के आगे पीछे कोई नहीं , जो सड़कों पर भीख माँगने को मजबूर हैं । ऐसे माता पिता के लिए वृद्ध आश्रम बेशक एक वरदान है । पर बच्चों के व्यवहार से दुःखी होकर भरे-पूरे घर को त्याग कर या बच्चों द्वारा प्रताड़ित किये जाने पर वृद्ध आश्रम पर आश्रित होने वाले बुजुर्गों के लिए निश्चित ही यह बहुत दुःखद है ।

लेखिका:
शाम्भवी मिश्रा


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