वृद्ध माँ-बाप बोझ या हमारी जिम्मेदारी – क्या हैं उनके कानूनी अधिकार

“माली” जो अपनी बगिया सजाता है अपने हाथों से एक नन्हा सा बीज बोता है; दिन-रात उसकी देखभाल करता है,पानी देता है,खाद देता है ताकि वह एक नन्हा सा बीज सूख ना जाये। देखते ही देखते एक दिन वह नन्हा सा बीज पौधे में तब्दील हो जाता है। माली फिर उस एक बीज से जन्मे पौधे का पूरा ख़याल रखकर उसे एक फलदायी व् उपयोगी वृक्ष में दब्दील कर देता है । ऐसा करने में माली को कई वर्ष लग जाते हैं मगर माली जी-जान से उसकी हिफाजत और देखभाल में जुटा रहता है ये सोचकर कि एक दिन यह वृक्ष बड़ा होगा जिसकी छाँव में माली सुकून से अपने बुढ़ापे को व्यतीत करेगा। क्या आप जानते हैं वह माली और वृक्ष कौन है ? हमारे घर के बुजुर्ग माता पिता जो हमें पाल पोस कर वृक्ष जैसा मजबूत और फलदायी बनाते हैं यह सोचकर कि एक दिन वह हमारी छांव में सुकून से अपनी वृद्धावस्था को गुजरेंगे।



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वृद्धावस्था जिंदगी का एक ऐसा अंतिम पड़ाव है जिसमे मनुष्य को सिर्फ प्यार चाहिए होता है। बुजुर्गों को केवल अपने बच्चों का साथ चाहिए होता है कि वो हमेशा उनके पास रहें ताकि वो अपनी बूढी आँखों से उन्हें फलते-फूलते देखते रहें जिसके सहारे वे अपने बुढ़ापे कि नैया को पार लगा सकें । पर क्या असल में ऐसा हो पाता है ? क्या माली समान हमारे पता पिता जिन्होंने हमें एक फलते-फूलते वृक्ष में तब्दील किया ; क्या वो हमारी छाँव में बैठ पा रहे हैं ? यह सवाल कोई व्यक्तिगत सवाल नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक प्रश्न है जिसका जवाब हमारी 21वीं सदी कि पीढ़ी को देना होगा।

आज नन्हे बीज समान बच्चे बड़े हो जाते है , पौधे से वृक्ष बन जाते हैं या कहा जाये की समझदार हो जाते हैं तब वह माली समान अपने माता पिता को जिम्मेदारी नहीं बल्कि बोझ मान बैठते हैं। वे भूल जाते है कि माँ बाप जो एक माली कि तरह दिन रात एक करके उनको खाद और पानी देता रहा तो क्या वो अपने बुढ़ापे में अपने ही हाथों बोये हुए उस वृक्ष की छाँव तले बैठ भी नहीं सकता। जिसकी सहायता से हम शिशु से एक वयस्क इंसान के रूप में बड़े हुए, जिनकी दया से हम काबिल बने है क्या हम उनके साथ अन्याय नहीं कर रहे। आखिर क्यों हमें अपने ही माता-पिता एक समय के बाद बोझ लगने लगते हैं ? क्या सिर्फ इस लिए कि वो हमारी आधुनिकता कि कसौटी पर खरे नहीं उतर पाते या फिर उनकी और हमारी सोच मेल नहीं खाती। ऐसे तमाम प्रश्न अनायास ही मन में आने लगते हैं जब मैं देखती हूँ की एक असहाय बुजुर्ग कैसे अपने ही पुत्र व् पुत्रिओं द्वारा घरेलु हिंसा का शिकार हो रहा है।

समाज में तेजी से बढ़ते हुए Old Age Homes (वृद्धाश्रम) इस बात का प्रमाण हैं कि बुजुर्ग हमारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि एक बोझ है। आज-कल कि भागती दौड़ती जिंदगी में बुजुर्ग हेय कि दृष्टि से देखा जाने लगा है। वो माली जिसने हमें सींचा और खड़े होने लायक बनाया उसे हम यह कहने से भी नहीं कतराते कि तुमने हमारे लिए किया ही क्या है। कुछ तो ऐसे भी ताने मारते हैं कि बच्चे पैदा करना और उनको पालना तो माता पिता का कर्तव्य है इसमें नया क्या है ये तो उन्हें करना ही था परन्तु दुःख इस बात का है कि माता-पिता का कर्तव्य देखने वाले बच्चे क्या वो अपना कर्तव्य भूल चुके हैं । आजकल बुजुर्गो क़ि ऐसी दयनीय स्थिति है क़ि आज बुजर्गो घर के एक कोने में पड़ा रहता या वो वृद्धाश्रम भेज दिया जाता है। क्या हम अपने माता-पिता की देखभाल नहीं कर सकते ? उनका भरण-पोषण नहीं कर सकते ? जिन्होंने हमे सक्षम बनाने के लिए हर संभव प्रयास किया । बेटा, बहु, नाती-पोते उनसे बात तक नहीं करना पसंद करते है क्योंकि वे उनको Old Man या Old Women लगते हैं। बुजुर्ग अपने बच्चों को सलाह तक नहीं दे सकते क्योंकि उनका कुछ कहना दखल अंदाजी हो जाता है और वो दखल ना बेटा बर्दाश्त करता है ना ही घर कि बहू जिसकी वजह से घरेलू तनाव उत्पन्न होते हैं जो हिंसा का भी रूप ले लेते हैं। भारत में बुजुर्गो पर अत्याचार के मांमले बढ़ते ही जा रहे है चाहे एक छोटा शहर हो या दिल्ली, मुंबई जैसे महानगर हर जगह बुजुर्गों से related आपराधिक मामले बढ़ते ही जा रहे हैं।

घरेलू हिंसा , वैचारिक मतभेद और फिर संपत्ति विवाद को ध्यान में रखकर देश की सर्वोच्च न्यायलय नें ऐसे कई अहम् फैसले लिए जो बुजुर्गों के हित में है। सर्वोच्च न्यायलय द्वारा लिए हुए फैसलों ने सच में बुजुर्गों को राहत पहुंचाई है मगर फिर भी अपराध में कुछ खास कमी नहीं आयी। यहाँ मैं उन अधिकारों को दिखाना चाहूंगी जिसे देश की सर्वोच्च न्यायलय ने बुजुर्गों को प्रदान किये हैं।

भारतीय सवविधान में बुजुर्ग पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए कानून भी बनाये गए है आइये गौर करते है ।





Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007

संतान अपने माता-पिता की संपत्ति पर गैरकानूनी रूप से कब्ज़ा नहीं कर सकता है ऐसा करना दंडनीय होगा और उनकी देखभाल ना करने पर उन्हें तीन माह की कैद तथा 5000 रूपये जुरमाना देना होगा ।

1- माता-पिता या एक वरिष्ठ नागरिक जो स्वयं की अपनी कमाई या उसकी स्वामित्व वाली संपत्ति से खुद के रख रखाव में असमर्थ हैं,वह अपने बच्चो पर अपने रखरखाव का दावा कर सकता है ।

2- इस अधिनियम में आगे यह कहा गया है की यदि रखरखाव का दावा करने वाला दादा- दादी या माता – पिता है और उनके बच्चे या पोता -पोती अभी नाबालिग है तो वह ये दावा अपने रिलेटिव पर भी कर सकते है जो उसकी मृत्यु के बाद उसका उत्तराधिकारी होगा ।

3- दायित्व की सीमा- यह अधिनियम एक वरिष्ठ नागरिक के रिश्तेदारों पर इसे पूर्ण दायित्व बनाने की कोशिश नहीं करता है। अधिनियम में कहा गया है कि जिन रिश्तेदारों से इस तरह के रखरखाव का दावा किया जा रहा है उनमें ऐसे दावेदार के देखभाल के लिए पर्याप्त साधन होने चाहिए। इसके अलावा, इस अधिनियम में यह भी एक प्रावधान शामिल है, जिसमें कहा गया है कि इस तरह के व्यक्ति को वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति का अधिकार होना चाहिए,या वरिष्ठ नागरिकों की संपत्ति का उत्तराधिकारी होगा। केवल उपरोक्त शर्तों को पूरा करने पर रिश्तेदार को वरिष्ठ नागरिक की देखभाल करने के लिए कहा जा सकता है। अधिनियम में एक और प्रावधान है, जिसमें सभी रिश्तेदारों द्वारा आनुपातिक भुगतान के बारे में बताया गया है, यदि रिश्तेदार एक से अधिक हो और सभी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति का वारिस होने के हकदार हैं तो रखरखाव इस तरह के रिश्तेदारों द्वारा अनुपात में देय होगा ।

4- ऐसी परिस्थिति में जब वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति अपने उत्तराधिकारी के नाम कर चूका है पर इस शर्त पर क़ि वह उसकी आर्थिक एवं शारीरिक जरूरतों का भरण पोषण करें । यदि संपत्ति का अधिकारी ऐसा नहीं करता है तो देयकर्ता (माता पिता या वरिष्ठ नागरिक ) अपनी संपत्ति वापस ले सकता है ।

5- सरकार ने यह आदेश दिया है की प्रत्येक राज्य के हर जिले में कम से कम एक वृद्धाश्रम हो ताकि वह वरिष्ठ नागरिक जिनका कोई नहीं है उनका रखरखाव बेहतर तरीके से वृद्धाश्रम में हो सके ।

6- सरकारी अस्पतालों में बुजुर्गो के उपचार का अलग से प्रावधान है उनके लिए अलग से पंक्तिया व्यवस्थित की गई है ताकि उन्हें अधिक समय तक कतार में इंतज़ार ना करना पड़े उनके उपचार के लिए सुविधाओं का विस्तार किया गया है हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिया है की जो संतान अपने माता-पिता के साथ किसी भी प्रकार का कोई भी दुर्व्यवहार करते हैं तो उस माता-पिता को यह पूरा अधिकार है कि वह अपने संतान को अपनी संपत्ति से बेदखल कर सकता है।

कानून तो है पर अब सवाल उठता है कि फिर भी बुजुर्गो के साथ ऐसा क्यों होता है ? जानकारी का अभाव में , बहुतया हमें अपने कानूनी अधिकारों का ज्ञान नहीं होता है और छोटे- छोटे शहरों और गाँवो में लोगों की कानून तक पहुँच नहीं होती है, और होती भी है तो कई बार माँ-बाप अपने बच्चों से इतना प्यार करते हैं क़ि उनके द्वारा किये गए दुर्व्यवहार को भी सह लेते हैं ताकि उन्हें कोई दिक्क्त ना हो। बुजुर्ग माता पिता अपने बच्चों के अत्याचारों के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाते हैं और बच्चे भी निश्चिंत होते हैं क़ि माँ-बाप कभी भी उनके खिलाफ कोई कदम नहीं लेंगे ।

पर जरा सोचिये ऐसी स्थिति ही क्यों आती है क़ि बच्चे ऐसा करें और माता-पिता को ऐसी दयनीय स्थिति से गुजरना पड़े। माता-पिता ही अपनी संपत्ति के अधिकारी हैं वह अपनी मर्जी से इसका उपयोग खुद के लिए करें अपने बच्चो को पूरी तरह ना सौपें उन पर निर्भर ना बनें। यदि अपनी संपत्ति बच्चों के नाम करते भी हैं तो अब उनको पूर्ण अधिकार है क़ि वह दी हुयी अपनी संपत्ति को पुनः वापस ले सकते है। हर भारतीय नागरिक को आवश्यकता है अपने कानूनी अधिकारों को जानने की और बुजुर्गो के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की ।

एक और बात हमे याद रखने की जरूरत है कि भारत भूमि जँहा माता -पिता को भगवान् का दर्जा दिया जाता है उन्हें पूजनीय माना जाता है, जरुरत है इन संस्कारों को अपने बच्चों को सिखाने की, सिर्फ सिखाने की ही नहीं बल्कि हम सब अपने बच्चों के सामनें खुद एक उदाहरण बनें। आप और मैं जैसा व्यव्हार अपने माता-पिता से करेंगे वैसा ही व्यव्हार आपके और मेरे बच्चे भी सीखेंगे।

माता पिता बोझ नहीं हैं वह हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी हैं। जरा सोचिये अगर उन्होंने ने भी हमें बोझ समझ कर हमारा ख्याल नहीं रखा होता तो आज हम वह ना होते जो आज हम हैं ; उन्हें समझिये उनका ख्याल रखिये उन्हें प्यार दीजिये उन्हें सिर्फ आपका साथ चाहिए और कुछ नहीं I माता-पिता और बेटा-बेटी के बीच माली और पौधे का रिश्ता है। मैं यह चाहूंगी कि माली यूँही अपने हाथों से पौधे को सींचतारहे ताकि एक दिन वह पौधा वृक्ष का रूप लेकर अपने माली समान माँ – बाप को अपनी छाँव में बिठा सके जिससे कि उनकी लम्बी थकान दूर हो सके।

” इन नन्हे क़दमों से जब पहली बार चला था तू !
तो साथ तेरे तेरी ऊँगली पकड़ कर चल पड़ा था मैं !
आज फिर चल पड़ा हूँ मैं अपने आखिरी सफर की ओर !
जँहा ना जिंदगी की भाग दौड़ है ना बाजारों का शोर !
बस कुछ कदम ही बाकी है इस जिंदगी के सफर में !
कभी याद कर लेना मुझको भी आगे अपनी जिंदगी में !
बूढ़े क़दमों से आज लड़खड़ा रहा हूँ मैं !
हाथ पकड़ ले मेरा तुझको बुला रहा हु मैं !
हाथ पकड़ ले मेरा तुझको बुला रहा हु मैं !! ”