पारिवारिक रिश्ते नातों में परख नहीं सम्मान का होना जरूरी

“परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता”
स्वर्गीय श्री जगजीत सिंह जी की बेहद ही खूबसूरत गजल जो कि हमारे जीवन मे बिल्कुल सटीक बैठती है।

चूँकि मनुष्य बहूत ही स्वार्थी होता है, हर पल उसे अपने “मैं” की चिंता लगी रहती है; वह जीवन मे स्वयं को सबसे उच्च स्थान देता है वही करता है जो उसके “मैं” को संतोष पहुचाता है। वह रिश्तों से जुड़ता है क्योंकि स्वयं खुश रह सके , उन रिश्तों को तोड़ देता है क्योंकि स्वयं खुश नहीं है। अपने जीवन को सुगम बनाने की आपा-धापी में लगा रहता है किसी से मुस्कुराकर बात तक करने की फुरसत नहीं होती। वह अपने द्वारा तय आयामों को हासिल कर समृद्ध जीवन जीने भी लगता है; परन्तु वह खुश रह पाता है? शायद नहीं , वह स्वयं को अकेला महसूस करता है। जीवन के भागम भाग में उसके अपने पीछे छूट चुके होते हैं जिनके साथ वह अपनी खुशियों को बाँटना चाह रहा होता है पर मनुष्य के अंदर ‘मैं’ की प्रवृत्ति उसे अपनों से मीलों दूर धकेल देती है।



क्या हम अपने रिश्ते नातों को समझ पाते हैं

और यहाँ तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए खुशियों की परिभाषाएं भी अलग-अलग होती हैं। किसी को पैसा चाहिए तो किसी को सुकून, किसी को प्रेम चाहिए तो किसी को अलगाव। जिस इंसान के पास जो नहीं है वह सदा उसी में अपनी खुशी तलाशता है जो उसे उसमे कभी मिलती ही नहीं..और इसी जीवन चक्र में भागते-भागते एक दिन इस जीवन का अंत हो जाता है। अक्सर हम अपने जीवन को समझ नहीं पाते हैं, हमें वास्तव में क्या चाहिए और जिस राह पर हम निकल पड़े हैं क्या उसकी मंजिल वही है जिसकी हमें तलाश होती है। हमारे वो अपने करीबी रिशते उनका भी मूल्य हमें तभी समझ आता है जब वह हमारे जीवन से चले जाते हैं यही मनुष्य की प्रवृति होती है।




मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, कोई भी व्यक्ति अकेला नहीं होता; अपने आस-पास के लोगों से जुड़ा होता है चाहे वह अपने रिश्ते हों या फिर मित्र । परंतु मनुष्य स्वयं से जुड़े प्रत्येक लोगों को भी सदैव अपने स्वार्थ के तराजू पर तौलता है और आज के आधुनिक मनुष्य की तो बात ही अलग है वह स्वार्थ की चरम सीमा पर पहुँच चुका है। वह हर जगह अपनी प्राथमिकताएं तलाशने की कोशिश करता है सिर्फ और सिर्फ अपनी सहूलियतों के दायरे में जीना चाहता है। जो भी इस दायरे में नहीं आते हैं उनसे वह अलग हो जाता है फिर चाहे वह उसके माता पिता , भाई बहन , पत्नी बच्चे हों या मित्र । हम यह तो मानते हैं कि प्रत्येक मनुष्य का अपना एक वजूद होता है, आदर्श होते हैं, विचारधारायें होती हैं परंतु सिर्फ स्वयं के लिए। हम दूसरों को भी अपने अनुसार ही चलाना चाहते हैं हम हमेशा दूसरों को गलत ठहराने में लगे रहते हैं अर्थात सिर्फ मैं सही तुम गलत।




वास्तव गलत सही तो कुछ होता ही नहीं अंतर सिर्फ अलग-अलग सोच विचार का होता है जो एक दूसरे से मेल नहीं खाती है। हम यह समझने की कोशिश ही नहीं करते और ऐसी स्थिति में हमारे अपने रिश्ते भी बोझिल हो जाते हैं। अक्सर यही हमारे मानवीय रिश्तों के टूटने का प्रमुख कारण बन जाता है।

परंतु क्या अपनों के बिना एकल जीवन जिया जा सकता हैं? अकेला जीवन कुछ पल का तो सुकून दे सकता है परंतु जीवनपर्यन्त हम असामाजिक होकर अकेले नहीं रह सकते हमें अपने रिश्तों की जरूरत होती है, लोगों के साथ कि जरूरत होती है।

हमारे रिश्ते बिल्कुल सूत के कच्चे धागे के समान होते हैं उन्हें खीच-तान कर नहीं उन्हें सहेज कर रखा जाता है। वास्तव में रिश्तों का आधार ही प्रेम होता हैं जिसमें-

स्वार्थ नहीं , त्याग होता है
तर्क नहीं , भाव होता है
परख नहीं, सम्मान होता है
मैं व तुम नहीं , सिर्फ हम होता है
एक दूजे पर विश्वास होता है

बस यही तो अपनो में प्रेम होता है, किन्तु आज के आधुनिक युग मे ना सयुंक्त परिवार रह गए हैं ना ढेरों रिशते। कुछ बचे खुचे करीबी रिशते हैं जिनसे आज भी हम जुड़े हुए हैं। उन्हें बनायें रखने के लिए हमें उनके नजरिये को भी समझना होगा उन्हें परख कर नहीं स्वीकार कर आगे बढ़ना होगा, रिश्तो में सम्मान का भाव लाना होगा, रिश्तों को हमें संजो कर रखना होगा।

सच मानिए यदि हम ऐसा करें तो हमारा जीवन कितना संतुलित और आनंदमय हो जायेगा जिसकी हम कल्पना दिनरात करते हैं।

लेखिका:
रचना शर्मा