प्रेम के असल मायने

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आज का दौरा असीम सुविधाओं का दौर है। इस दौर में सब कुछ इतना अधिक सुविधाजनक हो गया है कि प्रेम भी सुविधाओं पर ही आश्रित होता चला जा रहा है। एक नज़र से देखा जाए तो ऐसा होना लाज़मी भी है, क्योंकि जब कोई चीज सुविधाजनक नहीं होती तो वह संघर्षपूर्ण हो जाती है और संघर्षपूर्ण हो जाना युवा पीढ़ी के लिए इंटरनेट के स्लो हो जाने जैसा ही है। ऐसा नहीं कि सभी का नज़रिया प्रेम के लिए गलत है ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि हर एक का प्रेम के प्रति अपना जुदा नज़रिया है; मैं यहाँ किसी भी नज़रिए पर कटाक्ष नहीं कर रही हूँ। मैं तो बस प्रेम के असल मायने आपको बताना चाहती हूँ। मुझे उम्मीद है कि इस वर्चुअल दुनिया के बदलते परिवेश में आपको यह अत्यधिक रियल लगेगा।



Prem-Ke-Asal-Mayne-Kya-Hai-Prem प्रेम के असल मायने क्या है प्रेम

ना जाने वह समा कहां गया जब WhatsApp मैसेजेस से ज़्यादा आँखों को पढ़ा जाता था। ना जाने वो आलम कहाँ गया जब साँसों की आवाज सुनकर रूह का हाल तक पता चल जाता था। ऐसा नहीं है कि आज के दौर में प्रेम नहीं होता, प्रेम होता ज़रूर है लेकिन वो बदल जाता है और जो नहीं बदलता बस वही प्रेम है। इसलिए Prem का होना जायज़ भी है, तो जो भी शख्स प्रेम में है मैं उसके बारे में बात नहीं कर रही मैं यहाँ उसके बारे में बात कर रही हूँ, जिसको ग़लतफहमी है कि वह प्रेम में है।




दरअसल बात महज़ इतनी सी है कि आज के वक्त में लोग Love में नहीं बल्कि Relationship में होते हैं, जी हाँ रिलेशनशिप दो लोगों के दरमियान अपरिभाषित रिश्ते को हैशटैग प्रदान करता हुआ एक बेबाक अस्त्र है और जब दो लोग एक दूसरे से ऊबकर बुरी आदत की तरह से एक दूसरे के साथ को बदल देना चाहते हैं तो वह उसे Break-up का नाम दे दिया करते हैं और यदि आगे चलकर उस बुरी आदत को फिर से अपनाने का मन कर जाए तो उसे Patch-up करार दे दिया जाता है। लेकिन इस बदलती मानसिकता के बीच में यदि किसी चीज का सरेआम कत्ल कर दिया जाता है तो वह है प्रेम। Love यानि प्यार को अब बस 2 डेट एक कप कॉफी के ऊपर आश्रित कर दिया जाता है और बिछड़ जाने पर एक्स (Ex) का नाम दे दिया जाता है। इस प्रक्रिया को Prem कहना तो कहीं से कहीं तक सटीक नहीं, अरे सटीक छोड़िए यह तो दूर-दूर तक प्रेम नहीं।




प्रेम किसी के पास होने या दूर होने से नहीं होता प्रेम बस किसी से होता है। प्रेम पर कोई शर्तें लागू नहीं होती और अगर लागू हो जाए तो वह समझौता बन जाता है। प्रेम वहाँ से शुरू होता है जहाँ से यह सब खत्म हो जाता है। प्रेम में अपेक्षाएं नहीं होती हैं, प्रेम में जिया जाता हैं, प्रेम में रहा नहीं जाता। प्रेम को किसी भी शक्ल में बाँधा नहीं जाता, प्रेम किसी आजाद पक्षी सा है जो अपने हिस्से का आसमान तलाश ही लेता है। जब प्रेम होता है तो कुछ भी नहीं होता सिर्फ़ प्रेम होता है।

लेखिका:
वैदेही शर्मा


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