मन कहता है पंछी बन जाऊं

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मन कहता है, पंछी मन सा सुदृढ़ मैं बन जाऊं
पंख बिना ही उच्च गगन की सीमा को छू आऊं ।

कभी तपूं मैं सूर्य ताप में, तेज हवाओं से टकराऊं
बढ़ती रहूं संघर्ष करूं, तिनका-तिनका जोड़ एक घोंसला बनाऊं ।

पीछे छोड़ आडंबर सारे, निश्छल सहज भाव अपनाऊं
मन को बांधे मन की जंजीरे, सब तोड़ अब आजाद परिंदा कहलाऊं ।

पिंजरबंध हैं सपने मेरे, हो स्वतंत्र उन्हें जीवंत कर आऊं
मुझे ना रोके बाधा कोई, पंखों की ताकत से आत्मविश्वास जगाऊं।

रुकना नहीं हो जैसे मुझको, नित नया पड़ाव पार कर जाऊं
स्वयं मैं परखूं शक्ति अपनी, क्षमताओं के परे प्रयास कर जाऊं ।

प्रतिक्षण अनुभव करूं जीवन का, महत्वकांक्षाओं को रोज बढ़ाऊं
कर्म पथ पर चलती रहूं और मनुष्य रूप यह यथार्थ कर जाऊं ।

मन कहता हैं पंछी मन सा सुदृढ़ मैं बन जाऊं
पंख बिना ही उच्च गगन की सीमा को छू आऊं ।

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मन पंछी

ऊंचे आसमान में उड़ते हुए पंछीयों को जब भी मैं देखती हूँ तो विचारों के सागर में डूबती चली जाती हूँ। सदैव क्रियाशील ,रास्ते में आने वाली प्रत्येक बाधा को पार कर ऊंचाइयों को अपने दम पर छूने वाले पंछी मुझे असीमित क्षमताओं से परिपूर्ण नजर आते हैं। सीमारहित विशालकाय आकाश में पंख पसारे ऊंचाइयों तक उड़ते ही चले जाना स्वतंत्रता का भाव प्रकट करता है। कितने आजाद हैं यह पंछी प्रत्येक दिशा में स्वतन्त्र रूप से विचरण करने को।

आसमान जो मेरे लिए वहीं तक सिमित हो पाता है जंहा तक मैं उसे देख पाती हूँ। परन्तु अनंत आसमान के उस छोर तक पहुंचने के लिए भी ये पंछी सक्षम हैं जो मेरे लिए अदृश्य है। वैसे तो पंछीयों के पास पंख उनके लिए गति का साधन हैं, उनके लिए उड़ना एक स्वाभाविक क्रिया है परन्तु वह भी हमारी तरह सजीव हैं तो क्या वह विचरण सिर्फ अपने जीवन निर्वाह की आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए करते हैं !! और एक क्रीड़ा की क्रिया के रूप में वह आसमान में उड़ान भरते हैं या वह इस क्रिया को वास्तव में अपनी असीमित क्षमता के रूप में समझते हैं। शायद उनके चारों ओर फैले अनंत आसमान को देख उनमे महत्वकांक्षा जागृत होती होगी स्वयं से पूछते होंगे क्या मेरे पंखो में इतनी ताकत है कि मैं आसमान के उस छोर तक भी पहुंच पाऊं जहां तक पहुंचना शायद मेरी क्षमताओं के परे है।

निश्चय ही वह स्वयं अपने उड़ान को एक चुनौती के रूप में लेते होंगे और एक प्रश्न स्वयं से हर बार करते होंगे की क्या मेरी क्षमता इतनी ही है और खुद को हर बार हराकर कर सफलता का एक नया मुकाम प्राप्त करते होंगे। निश्चय ही उन्हें अपने पंखो की ताकत पर विश्वास होगा, वह थकते होंगे पर रुकते नहीं होंगे।

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पंछी की तरह अपनी असीमित क्षमताओं को पहचानें

पंछीयों का अपनी क्षमताओं को परखना व् स्वयं से यह प्रश्न करना की क्या “मैं यह कर सकता हूँ” उनको अनंत ऊंचाइयों तक उड़ते देख उमड़ते विचार यहां केवल मेरे मनुष्य मन की अभिव्यक्ति हो सकती है परन्तु यह विचार हम मनुष्यों को इस प्रश्न से जोड़ते हैं। क्या हम स्वयं से यह प्रश्न करते हैं, क्या मैं यह कर सकता हूँ, मेरी क्षमताएं क्या हैं, कौन हूँ मैं, जीवन में मेरा उद्देश्य क्या है ?

हमारा स्वयं से प्रश्न करना बहुत ही जरुरी है क्योंकि इन प्रश्नों के जवाब में हम एक असीमित क्षमताओं के परिपूर्ण व्यक्तित्व से मिल पाएंगे। जी हाँ हम स्वयं से मिल पाएंगे, हम मनुष्य हैं और हमारी क्षमता है हमारी अत्यधिक विकसित बुद्धि। हम सभी जीवो में सर्व बुद्धिमान हैं। आज मनुष्य ने अपने कार्यों से अपनी सर्व बुद्धिमता को साबित भी कर दिया है। आज मनुष्य चाँद, मंगल जैसे ग्रहों पर भी पहुँच चुका है, हमारे आस-पास बुद्धिजीवियों के कम उदारहण नहीं हैं। परन्तु एक आम इंसान जो स्वयं को अपने ही द्वारा बनायी गई मानसिक बंधनो में जकड़े हुए है जो अपनी क्षमताओं से अभी अज्ञात है, जो जीवन में आगे बढ़ना चाहता है परन्तु वह स्वयं की नजरो में सबसे कम है। क्योंकि वह अपने आस-पास सक्षम लोगों की भीड़ को देख पाता है वह सबसे पहले अपनी योग्यता को नहीं अन्य की योग्यताओं को जांचता है और स्वयं का मनोबल खो देता है। क्या मैं कर सकता हूँ ? का जवाब उसे “मैं नहीं कर सकता” में मिलता है। असक्षम कोई नहीं होता, योग्यता सब में होती है; सिर्फ हमें स्वयं की योग्यताओं पर केंद्रित होने की आवश्यकता है। उन्हें विकसित करने की आवश्यकता है।

अज्ञान और ज्ञान के मध्य, असक्षमता व् सक्षमता के मध्य, असफलता व् सफलता के मध्य एक प्रक्रिया निहित होती है। “निरंतर सिखने की प्रक्रिया” हमारा मष्तिष्क कुछ इस प्रकार कार्य करता है की जब भी हम कुछ नया सीखते हैं तब हमारे मस्तिष्क की तंत्रिकाओ की संरचना बदल जाती है और हमारा मस्तिष्क तांत्रिकों का एक नेटवर्क है जो पारस्परिक सहयोग से कार्य करता है। हमारी बुद्धि का सदैव विकास होता रहेगा यदि हम निरंतर कार्य करते रहें ज्ञान प्राप्त करते रहें और सीखते रहें।

क्षमताओं की कोई भी सीमा नहीं होती है यह अनंत है। इसीलिए निरंतरता जरुरी है और साथ ही अपने योग्यताओं के स्तर से ऊपर उठना और रुकना नहीं। अपनी क्षमताओं को परखना, जांचना, स्वयं की योग्यता से संघर्ष हमें हमारे लक्ष्य प्राप्ति की ओर शीघ्रता से ले जाएगा। याद रखिये की हीरे को भी इस प्रकार तराशा जाता है कि जब प्रकाश किरण उसमे प्रवेश करती है तब वह उसे परिवर्तित कर सभी दिशाओं में कई गुना प्रकाश के साथ फैल जाती है। तब जाकर वह इतना चमकदार दिखाई देता है और तब वह वास्तव में अपने स्वरूप में होता है और हिरा कहलाता है।

इसीलिए खुद को निखारिये जहां अभी आप हैं उस स्तर से निरंतर आगे बढ़ते रहिये। सपने बड़े देखिये लक्ष्य ऊँचे बनाइये परन्तु लक्ष्य प्राप्ति के प्रत्येक प्रयास को महत्वपूर्ण मानिये उन्हें छोटे-छोटे लक्ष्य मानकर आगे बढ़ें इससे हमारा आत्मविश्वाश बढ़ेगा और हम अपने सपनो के आसमान में ऐसी उड़ान भरेंगे जहां बाधाएं भी होंगी पर हम उन्हें आसानी से पार कर जाएंगे और भौतिक पँखो के बिना भी ऊंचा उड़ते चले जायेंगे।

लेखिका:
रचना शर्मा


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